Extra 5%* Off all Prepaid Orders Free Shipping on Order Above ₹499/- Authentic • Sacred • Pure Extra 5%* Off all Prepaid Orders Free Shipping on Order Above ₹499/-
Extra 5%* Off All Prepaid Orders Free Shipping on Orders Above ₹499/- Authentic • Sacred • Pure Extra 5%* Off All Prepaid Orders Free Shipping on Orders Above ₹499/- Authentic • Sacred • Pure
श्री हनुमान जी – श्री हनुमत् कवचम्

श्री हनुमत् कवचम्

Shri Hanumat Kavacham

भक्ति, साहस, आत्मबल और श्री हनुमान जी की कृपा का स्मरण कराने वाला प्रचलित संस्कृत रक्षा स्तोत्र।

श्री हनुमत् कवचम् का परिचय

श्री हनुमत् कवचम् भगवान श्री हनुमान जी की स्तुति में रचित एक प्रचलित संस्कृत कवच स्तोत्र है। इसमें हनुमान जी के पराक्रम, श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति और भक्त की रक्षा के लिए उनके विभिन्न स्वरूपों का स्मरण किया गया है।

इस कवच में विनियोग के बाद 17 श्लोक हैं। इसके श्लोकों में हनुमान जी के गुणों का वर्णन, शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा की प्रार्थना और कवच-पाठ की फलश्रुति दी गई है।

विनियोग

अस्य श्री हनुमत् कवचस्तोत्रमहामन्त्रस्य वसिष्ठ ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्री हनुमान् देवता मारुतात्मज इति बीजं अञ्जनासूनुरिति शक्तिः वायुपुत्र इति कीलकं हनुमत्प्रसाद सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥
सरल अर्थ: इस श्री हनुमत् कवच स्तोत्र के ऋषि वशिष्ठ हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता श्री हनुमान जी हैं। मारुतात्मज इसका बीज, अञ्जनासूनु इसकी शक्ति तथा वायुपुत्र इसका कीलक माने गए हैं। हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने के उद्देश्य से इसका पाठ किया जाता है।

श्री हनुमत् कवचम् – संस्कृत पाठ एवं हिन्दी अर्थ

॥ श्लोक १ ॥

उल्लङ्घ्य सिन्धोस्सलिलं सलीलं यश्शोकवह्निं जनकात्मजायाः । आदाय तेनैव ददाह लङ्कां नमामि तं प्राञ्जलिराञ्जनेयम् ॥ १ ॥
भावार्थ: जिन्होंने सहज ही समुद्र को पार किया, माता सीता के शोक रूपी अग्नि को अपने हृदय में धारण कर उसी तेज से लंका का दहन किया, उन अञ्जनीपुत्र हनुमान जी को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।

॥ श्लोक २ ॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शिरसा नमामि ॥ २ ॥
भावार्थ: जो मन के समान तीव्र गति वाले, वायु के समान वेगवान, इन्द्रियों को जीतने वाले और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, उन वानरश्रेष्ठ, पवनपुत्र एवं श्रीरामदूत हनुमान जी को मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ।

॥ श्लोक ३ ॥

उद्यदादित्यसङ्काशं उदारभुजविक्रमम् । कन्दर्पकोटिलावण्यं सर्वविद्याविशारदम् ॥ ३ ॥
भावार्थ: जिनका तेज उदित होते हुए सूर्य के समान है, जिनकी भुजाओं में महान पराक्रम है, जिनका सौन्दर्य करोड़ों कामदेवों के समान है और जो समस्त विद्याओं में निपुण हैं, उन हनुमान जी का स्मरण करता हूँ।

॥ श्लोक ४ ॥

श्रीरामहृदयानन्दं भक्तकल्पमहीरुहम् । अभयं वरदं दोर्भ्यां कलये मारुतात्मजम् ॥ ४ ॥
भावार्थ: जो श्रीराम के हृदय को आनंद प्रदान करते हैं, भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं और अपनी दोनों भुजाओं से अभय तथा वर प्रदान करते हैं, उन पवनपुत्र हनुमान जी का मैं ध्यान करता हूँ।

॥ श्लोक ५ ॥

श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ ५ ॥
भावार्थ: इस श्लोक में श्रीराम नाम की महिमा बताई गई है। भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि 'राम' नाम का स्मरण सहस्रनाम के समान फलदायी माना गया है।

॥ श्लोक ६ ॥

पादौ वायुसुतः पातु रामदूतस्तदङ्गुलीः । गुल्फौ हरीश्वरः पातु जङ्घे चार्णवलङ्घनः ॥ ६ ॥
भावार्थ: पवनपुत्र मेरे पैरों की, श्रीरामदूत पैरों की उँगलियों की, वानरराज टखनों की और समुद्र लाँघने वाले हनुमान जी मेरी पिंडलियों की रक्षा करें।

॥ श्लोक ७ ॥

जानुनी मारुतिः पातु ऊरू पात्वसुरान्तकः । गुह्यं वज्रतनुः पातु जघनं तु जगद्धितः ॥ ७ ॥
भावार्थ: मारुति मेरे घुटनों की, असुरों का संहार करने वाले मेरी जाँघों की, वज्र के समान शरीर वाले मेरे गुप्त अंगों की और जगत का कल्याण करने वाले हनुमान जी मेरे कटि-प्रदेश की रक्षा करें।

॥ श्लोक ८ ॥

आञ्जनेयः कटिं पातु नाभिं सौमित्रिजीवनः । उदरं पातु हृद्गेही हृदयं च महाबलः ॥ ८ ॥
भावार्थ: अञ्जनीपुत्र मेरी कमर की, लक्ष्मण को जीवनदान देने वाले मेरी नाभि की, हृदय में निवास करने वाले मेरे उदर की और महाबली हनुमान जी मेरे हृदय की रक्षा करें।

॥ श्लोक ९ ॥

वक्षो वालायुधः पातु स्तनौ चाऽमितविक्रमः । पार्श्वौ जितेन्द्रियः पातु बाहू सुग्रीवमन्त्रकृत् ॥ ९ ॥
भावार्थ: पूँछ को अस्त्र बनाने वाले हनुमान जी मेरी छाती की, असीम पराक्रमी मेरे वक्षस्थल की, जितेन्द्रिय मेरे दोनों पार्श्वों की और सुग्रीव को उचित परामर्श देने वाले मेरी भुजाओं की रक्षा करें।

॥ श्लोक १० ॥

करावक्ष जयी पातु हनुमांश्च तदङ्गुलीः । पृष्ठं भविष्यद्ब्रह्मा च स्कन्धौ मतिमतां वरः ॥ १० ॥
भावार्थ: विजय प्राप्त करने वाले हनुमान जी मेरे हाथों और उनकी उँगलियों की रक्षा करें। ब्रह्मा स्वरूप तथा बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हनुमान जी मेरी पीठ और कंधों की रक्षा करें।

॥ श्लोक ११ ॥

कण्ठं पातु कपिश्रेष्ठो मुखं रावणदर्पहा । वक्त्रं च वक्तृप्रवणो नेत्रे देवगणस्तुतः ॥ ११ ॥
भावार्थ: वानरों में श्रेष्ठ हनुमान जी मेरे कंठ की, रावण का गर्व नष्ट करने वाले मेरे मुख की, वाणी में कुशल मेरे वक्त्र की और देवताओं द्वारा स्तुत हनुमान जी मेरी आँखों की रक्षा करें।

॥ श्लोक १२ ॥

ब्रह्मास्त्रसन्मानकरो भ्रुवौ मे पातु सर्वदा । कामरूपः कपोले मे फालं वज्रनखोऽवतु ॥ १२ ॥
भावार्थ: ब्रह्मास्त्र का सम्मान करने वाले हनुमान जी मेरी भौंहों की, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले मेरे गालों की और वज्र के समान नखों वाले हनुमान जी मेरे ललाट की सदा रक्षा करें।

॥ श्लोक १३ ॥

शिरो मे पातु सततं जानकीशोकनाशनः । श्रीरामभक्तप्रवरः पातु सर्वकलेबरम् ॥ १३ ॥
भावार्थ: माता जानकी के शोक को दूर करने वाले हनुमान जी मेरे सिर की सदा रक्षा करें। श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी मेरे सम्पूर्ण शरीर की रक्षा करें।

॥ श्लोक १४ ॥

मामह्नि पातु सर्वज्ञः पातु रात्रौ महायशाः । विवस्वदन्तेवासी च सन्ध्ययोः पातु सर्वदा ॥ १४ ॥
भावार्थ: सर्वज्ञ हनुमान जी दिन में, महायशस्वी हनुमान जी रात में और सूर्यदेव के शिष्य हनुमान जी प्रातः तथा सायंकाल की संधि बेला में मेरी सदा रक्षा करें।

॥ श्लोक १५ ॥

ब्रह्मादिदेवतादत्तवरः पातु निरन्तरम् । य इदं कवचं नित्यं पठेच्च शृणुयान्नरः ॥ १५ ॥
भावार्थ: ब्रह्मा आदि देवताओं से वर प्राप्त करने वाले हनुमान जी निरंतर मेरी रक्षा करें। जो मनुष्य इस कवच का नियमित पाठ करता है अथवा श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसके लिए आगे फलश्रुति बताई गई है।

॥ श्लोक १६ ॥

दीर्घमायुरवाप्नोति बलं दृष्टिं च विन्दति । पादाक्रान्ता भविष्यन्ति पठतस्तस्य शत्रवः । स्थिरां सुकीर्तिमारोग्यं लभते शाश्वतं सुखम् ॥ १६ ॥
भावार्थ: इस कवच की फलश्रुति में दीर्घायु, बल, दृष्टि, स्थिर यश, आरोग्य और सुख की प्राप्ति का वर्णन है। पाठ करने वाले के शत्रु उसके सामने टिक नहीं पाते, ऐसा स्तोत्र में कहा गया है।

॥ श्लोक १७ ॥

इति निगदितवाक्यवृत्त तुभ्यं सकलमपि स्वयमाञ्जनेय वृत्तम् । अपि निजजनरक्षणैकदीक्षो वशग तदीय महामनुप्रभावः ॥ १७ ॥
भावार्थ: हे अञ्जनेय! आपके समस्त चरित्र और महिमा का वर्णन आपके समक्ष किया गया है। आप अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर हैं। श्रीराम के महान मंत्र का प्रभाव भी आपकी शक्ति में निहित है।
॥ इति श्री हनुमत् कवचम् ॥

इस प्रकार श्री हनुमत् कवच का पाठ पूर्ण होता है।

श्री हनुमत् कवचम् पाठ करने की विधि

  1. प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा स्थान में श्री हनुमान जी के चित्र या प्रतिमा के सामने बैठें।
  3. दीपक जलाकर भगवान श्रीराम और हनुमान जी का स्मरण करें।
  4. मन को शांत करके श्रद्धापूर्वक विनियोग और कवच का पाठ करें।
  5. पाठ के अंत में हनुमान जी को प्रणाम करके अपनी प्रार्थना अर्पित करें।
मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की विशेष पूजा के अवसर पर इसका पाठ किया जा सकता है। पाठ की संख्या और विधि अपनी श्रद्धा तथा पारिवारिक परंपरा के अनुसार रखें।

श्री हनुमत् कवचम् का धार्मिक महत्त्व

  • साहस और आत्मबल: हनुमान जी के पराक्रम का स्मरण व्यक्ति को साहस और धैर्य की प्रेरणा देता है।
  • श्रीराम भक्ति: यह कवच हनुमान जी की श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति का स्मरण कराता है।
  • रक्षा की प्रार्थना: इसमें शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा के लिए हनुमान जी से प्रार्थना की गई है।
  • अनुशासन और श्रद्धा: नियमित पाठ मन को एकाग्र करने और भक्ति-भाव बनाए रखने का माध्यम बन सकता है।

ये धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताएँ हैं। कवच-पाठ को चिकित्सा, सुरक्षा या अन्य आवश्यक व्यावहारिक उपायों का विकल्प नहीं समझना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

श्री हनुमत् कवचम् में कितने श्लोक हैं?

यहाँ प्रस्तुत प्रचलित पाठ में विनियोग के बाद कुल 17 श्लोक हैं।

श्री हनुमत् कवचम् का पाठ कब करना चाहिए?

इसका पाठ प्रातःकाल किया जा सकता है। मंगलवार और शनिवार को भी श्रद्धालु इसका पाठ करते हैं।

क्या महिलाएँ श्री हनुमत् कवचम् का पाठ कर सकती हैं?

भक्ति और श्रद्धा के साथ स्तोत्र-पाठ करने की परंपराएँ अलग-अलग परिवारों में भिन्न हो सकती हैं। अपने परिवार या गुरु-परंपरा के अनुसार आचरण करें।

क्या हनुमत् कवचम् और बजरंग बाण एक ही हैं?

नहीं। श्री हनुमत् कवचम् और बजरंग बाण अलग-अलग devotional रचनाएँ हैं। दोनों के पाठ और संरचना में अंतर है।

क्या इस कवच का हिन्दी अर्थ भी पढ़ सकते हैं?

हाँ। संस्कृत श्लोक के साथ उसका हिन्दी भावार्थ पढ़ने से उसके भाव और प्रार्थना को समझने में सहायता मिलती है।

संदर्भ एवं संपादकीय टिप्पणी

इस पृष्ठ पर प्रस्तुत संस्कृत पाठ श्री हनुमत् कवचम् के एक प्रचलित 17-श्लोकीय पाठ-संस्करण पर आधारित है। विभिन्न पुस्तकों और ऑनलाइन पाठों में कुछ शब्दों तथा वर्तनी के पाठांतर मिल सकते हैं। हिन्दी भावार्थ पाठकों की सरल समझ के लिए प्रस्तुत किया गया है।

संदर्भ: Stotra Nidhi – Sri Hanumat Kavacham 1

मूल संस्कृत पाठ देखें