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नवग्रह सूर्य स्तोत्रम् | Navagraha Surya Stotram – संस्कृत पाठ और हिन्दी अर्थ
॥ श्री नवग्रहस्तोत्रम् ॥

श्री नवग्रह सूर्य स्तोत्रम्

Navagraha Surya Stotram — नवग्रह स्तोत्र में सूर्यदेव की प्रथम स्तुति, नौ ग्रहों का संस्कृत पाठ और सरल हिन्दी भावार्थ।

भगवान सूर्यदेव — नवग्रह सूर्य स्तोत्रम्
नवग्रह सूर्य स्तोयदेव
नवग्रह सूर्य स्तोत्रम्

नवग्रह सूर्य स्तोत्रम् क्या है?

“जपाकुसुमसङ्काशं…” नवग्रह स्तोत्र का पहला श्लोक है, जिसमें भगवान सूर्य (दिवाकर) की स्तुति की जाती है। इसके बाद चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु की वंदना आती है।

इस पृष्ठ पर लोकप्रिय व्यास-विरचित परंपरा से संबद्ध नवग्रह स्तोत्र का पाठ दिया गया है। शीर्षक में “नवग्रह सूर्य स्तोत्रम्” से आशय इसके सूर्य-श्लोक सहित पूरे नवग्रह स्तोत्र से है।

नवग्रह स्तोत्र के अलग-अलग प्रकाशित पाठों में कुछ शब्दों, संयुक्ताक्षरों और समापन श्लोकों के पाठांतर मिल सकते हैं। नीचे दिया गया पाठ प्रचलित संस्करण पर आधारित है।

ध्यान दें: ज्योतिषीय या धार्मिक फलश्रुति आस्था और परंपरा का विषय है; इसे किसी निश्चित स्वास्थ्य, आर्थिक या जीवन-परिणाम की गारंटी न समझें।

९ ग्रहनवग्रह वंदना
संस्कृतमूल स्तोत्र भाषा
सूर्यप्रथम श्लोक
व्यासपरंपरागत attribution

नवग्रह स्तोत्र का महत्व और परंपरा

भारतीय धार्मिक-ज्योतिषीय परंपरा में नवग्रह नाम से सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु का सामूहिक स्मरण किया जाता है। यह स्तोत्र प्रत्येक ग्रह के स्वरूप और विशेषणों के माध्यम से उनकी वंदना करता है।

पहले श्लोक में सूर्य को जपा-पुष्प जैसी आभा वाला, कश्यप ऋषि का पुत्र, महान तेजस्वी और अंधकार का नाश करने वाला कहा गया है। इसीलिए “जपाकुसुमसंकाशं” सूर्य-वंदना का एक प्रसिद्ध आरंभिक पद है।

पारंपरिक रूप से जुड़े उद्देश्य

  • नवग्रहों का सामूहिक स्मरण और वंदना।
  • पूजा या दैनिक साधना में श्रद्धा और एकाग्रता।
  • प्रकाश, विवेक, धैर्य और संतुलन जैसे आध्यात्मिक मूल्यों का स्मरण।

इन उद्देश्यों का वर्णन धार्मिक परंपरा के संदर्भ में है; इसे वैज्ञानिक या निश्चित ज्योतिषीय परिणाम का दावा न समझें।

नवग्रह स्तोत्रम् — सम्पूर्ण संस्कृत पाठ एवं भावार्थ

नौ ग्रहों के श्लोक • सरल हिन्दी भावार्थ • English Meaning

सूर्य — श्लोक 1॥ 1 ॥
जपाकुसुमसङ्काशं काश्यपेयं महाद्युतिम् । तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥ १ ॥

हिन्दी भावार्थ: जपा (गुड़हल) के पुष्प के समान लाल आभा वाले, कश्यप ऋषि के पुत्र, महान तेजस्वी, अंधकार के शत्रु और दिवाकर सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।

English Meaning: I bow to Surya, radiant like the hibiscus flower, son of Kashyapa, enemy of darkness and the maker of day.

चन्द्र — श्लोक 2॥ 2 ॥
दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम् । नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ॥ २ ॥

हिन्दी भावार्थ: दही, शंख और हिम के समान उज्ज्वल, क्षीरसागर से प्रकट तथा शिव के मुकुट की शोभा चन्द्रदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।

English Meaning: I bow to Chandra, bright as curd, conch and snow, associated with the ocean of milk and adorning Shiva’s crown.

मंगल — श्लोक 3॥ 3 ॥
धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् । कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥ ३ ॥

हिन्दी भावार्थ: पृथ्वी से उत्पन्न, बिजली के समान तेजस्वी, शक्ति धारण करने वाले मंगलदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।

English Meaning: I bow to Mangala, born of the Earth, brilliant like lightning and bearing the spear.

बुध — श्लोक 4॥ 4 ॥
प्रियङ्गुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् । सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥ ४ ॥

हिन्दी भावार्थ: प्रियंगु की कली के समान श्यामवर्ण, अनुपम रूप और सौम्य गुणों से युक्त बुधदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।

English Meaning: I bow to Budha, dark like a priyangu bud, incomparable in form and endowed with gentle qualities.

गुरु — श्लोक 5॥ 5 ॥
देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसन्निभम् । बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥

हिन्दी भावार्थ: देवताओं और ऋषियों के गुरु, स्वर्ण के समान तेजस्वी, बुद्धि के प्रतीक बृहस्पति को मैं प्रणाम करता हूँ।

English Meaning: I bow to Brihaspati, teacher of gods and sages, golden in radiance and associated with wisdom.

शुक्र — श्लोक 6॥ 6 ॥
हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् । सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥ ६ ॥

हिन्दी भावार्थ: हिम, कुंद पुष्प और कमल-तंतु के समान उज्ज्वल, दैत्यों के गुरु और शास्त्रों के ज्ञाता शुक्राचार्य को मैं प्रणाम करता हूँ।

English Meaning: I bow to Shukra, bright as snow, jasmine and lotus fibre, teacher of the asuras and expounder of sacred knowledge.

शनि — श्लोक 7॥ 7 ॥
नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् । छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥ ७ ॥

हिन्दी भावार्थ: नील अंजन के समान वर्ण वाले, सूर्यपुत्र, छाया से उत्पन्न शनैश्चर को मैं प्रणाम करता हूँ।

English Meaning: I bow to Shani, dark like blue collyrium, son of the Sun and born of Chhaya.

राहु — श्लोक 8॥ 8 ॥
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम् । सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥ ८ ॥

हिन्दी भावार्थ: अर्धकाय, महान प्रभावशाली, सूर्य और चन्द्र को ग्रसने वाले तथा सिंहिका से उत्पन्न राहु को मैं प्रणाम करता हूँ।

English Meaning: I bow to Rahu, powerful and of a half-form, born of Simhika and associated with eclipses of the Sun and Moon.

केतु — श्लोक 9॥ 9 ॥
पलाशपुष्पसङ्काशं तारकाग्रहमस्तकम् । रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥ ९ ॥

हिन्दी भावार्थ: पलाश पुष्प के समान आभा वाले, उग्र स्वरूप के केतु को मैं प्रणाम करता हूँ।

English Meaning: I bow to Ketu, radiant like the palasha flower and described as fierce in this hymn.

फलश्रुति १॥
इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत् सुसमाहितः । दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥ १० ॥

हिन्दी भावार्थ: परंपरागत फलश्रुति कहती है कि जो व्यक्ति एकाग्र होकर इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके विघ्न शांत हों—ऐसी कामना की जाती है।

English Meaning: The traditional closing verse expresses the devotional hope that recitation with concentration may bring peace from obstacles.

फलश्रुति २॥
नरनारीनृपाणां च भवेद्दुःस्वप्ननाशनम् । ऐश्वर्यमतुलं तेषामारोग्यं पुष्टिवर्धनम् ॥ ११ ॥

हिन्दी भावार्थ: इस श्लोक में स्तोत्र-पाठ से दुःस्वप्न दूर होने, ऐश्वर्य, आरोग्य और पुष्टि की पारंपरिक कामना व्यक्त की गई है।

English Meaning: This verse traditionally associates the hymn with relief from bad dreams and wishes for well-being and prosperity.

फलश्रुति ३॥
ग्रहनक्षत्रजा पीडास्तस्कराग्निसमुद्भवाः । ताः सर्वाः प्रशमं यान्ति व्यासो ब्रूते न संशयः ॥ १२ ॥

हिन्दी भावार्थ: इसमें ग्रह-नक्षत्र तथा अन्य विपत्तियों से उत्पन्न कष्ट शांत होने की पारंपरिक फलश्रुति दी गई है।

English Meaning: The verse expresses a traditional belief that difficulties attributed to planets, stars and other dangers may be pacified.

नवग्रह स्तोत्र का पाठ कैसे करें?

  1. स्वच्छ स्थान पर बैठकर गणेशजी और इष्टदेव का स्मरण करें, यदि यह आपकी परंपरा का हिस्सा हो।
  2. सूर्य-उपासना के समय प्रातःकाल पाठ करना एक प्रचलित विकल्प है; नवग्रह स्तोत्र अन्य समय भी श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाता है।
  3. पहले सूर्य के श्लोक “जपाकुसुमसङ्काशं…” का पाठ करें और फिर क्रम से सभी नौ ग्रहों के श्लोक पढ़ें।
  4. उच्चारण में सुविधा के लिए पाठ को धीरे-धीरे पढ़ें और किसी विश्वसनीय संस्कृत पाठ से मिलान करें।
  5. विशिष्ट अनुष्ठान, संख्या या विधि के लिए अपने परिवार या परंपरा के योग्य आचार्य से मार्गदर्शन लें।

पूजा-विधि क्षेत्र, परिवार और सम्प्रदाय के अनुसार भिन्न हो सकती है। यह सामान्य जानकारी है, अनिवार्य विधि नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नवग्रह सूर्य स्तोत्र का पहला श्लोक कौन-सा है?

“जपाकुसुमसङ्काशं काश्यपेयं महाद्युतिम्। तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥” यह नवग्रह स्तोत्र में सूर्यदेव की वंदना है।

नवग्रह स्तोत्र के रचयिता कौन माने जाते हैं?

यह स्तोत्र परंपरागत रूप से महर्षि वेदव्यास से संबद्ध माना जाता है। अलग-अलग संस्करणों में आरंभ, पाठ और फलश्रुति में अंतर मिल सकता है।

क्या केवल सूर्य वाला श्लोक पढ़ सकते हैं?

भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार सूर्य-श्लोक का अलग से स्मरण कर सकते हैं। यदि संकल्प पूरे नवग्रह स्तोत्र के पाठ का है, तो सभी ग्रहों के श्लोक पढ़ें।

नवग्रह स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?

प्रातःकाल पाठ करना प्रचलित है, लेकिन समय और विधि अपनी परंपरा के अनुसार रखी जा सकती है।

क्या फलश्रुति निश्चित परिणाम की गारंटी देती है?

नहीं। फलश्रुति धार्मिक विश्वास और परंपरा का हिस्सा है; इसे किसी निश्चित भौतिक, चिकित्सकीय या ज्योतिषीय परिणाम की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।