शिव ताण्डव स्तोत्रShiva Tandava Stotram
भगवान शिव के ताण्डव, तेज, वैराग्य और दिव्य स्वरूप की स्तुति का प्रसिद्ध स्तोत्र — 15 प्रचलित श्लोक, सरल हिन्दी भावार्थ और English Meaning सहित।

शिव ताण्डव स्तोत्र
यह स्तोत्र परंपरागत रूप से रावण से संबद्ध माना जाता है और भगवान शिव के ताण्डवमय, उग्र तथा करुणामय स्वरूप की स्तुति करता है।
शिव ताण्डव स्तोत्र क्या है?
शिव ताण्डव स्तोत्र भगवान शिव की महिमा, उनके ताण्डव, जटाओं में प्रवाहित गंगा, चन्द्रमा, सर्प, नीलकण्ठ और त्रिनेत्र जैसे स्वरूपों का प्रभावशाली काव्यात्मक वर्णन करता है। इसके श्लोकों में गति, ध्वनि और अनुप्रास का प्रयोग पाठ को ताण्डव की लय का अनुभव कराता है।
रचना-परंपरा और रावण की कथा
प्रचलित परंपरा में इसे रावणकृत शिव ताण्डव स्तोत्र कहा जाता है। लोकप्रिय कथा के अनुसार कैलास से जुड़े प्रसंग में रावण ने भगवान शिव की स्तुति की और इसी भक्ति-भाव से यह स्तोत्र जोड़ा जाता है। कथा के अलग-अलग रूप मिलते हैं, इसलिए इसे परंपरागत आख्यान के रूप में समझना उचित है।
शिव ताण्डव स्तोत्र का आध्यात्मिक भाव
स्तोत्र के आरंभिक श्लोक शिव की जटाओं, गंगा, सर्प, चन्द्रमा और ललाट की अग्नि का गतिशील चित्र खींचते हैं। आगे शिव के ऐसे रूप का वर्णन आता है जो काम, अहंकार, भय और मोह जैसे बंधनों के अतिक्रमण का प्रतीक है। बारहवें श्लोक में समत्व का भाव विशेष रूप से सामने आता है—पत्थर और शय्या, मित्र और शत्रु, रत्न और मिट्टी जैसे भेदों से ऊपर उठकर सदाशिव की उपासना।
तेरहवें श्लोक में एक साधक की इच्छा दिखाई देती है—एकांत में रहकर शिव-मंत्र का स्मरण करना और दुष्ट विचारों से मुक्त होना। इस प्रकार स्तोत्र केवल शिव के बाहरी ताण्डव का वर्णन नहीं करता, बल्कि साधक के भीतर वैराग्य, भक्ति और समत्व की दिशा भी दिखाता है।
सम्पूर्ण शिव ताण्डव स्तोत्र — 15 श्लोक
गलेवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥ १ ॥
विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ २ ॥
स्फुरद्दिगन्त सन्तति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥ ३ ॥
कदम्ब कुङ्कुम द्रव प्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदान्ध सिन्धुर स्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ ४ ॥
प्रसूनधूलि धोरणी विधूसराङ्घ्रि पीठभूः ।
भुजङ्गराजमालया निबद्ध जाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धु शेखरः ॥ ५ ॥
भक्ति को पूजा और सेवा के भाव से आगे बढ़ाएँ
भगवान शिव और सनातन उपासना से जुड़े पूजा-सेवा और पूजन सामग्री के विकल्प देखें।

Baba Garibnath Temple, Muzaffarpur
बाबा गरीबनाथ धाम में शिव-पूजा सेवा देखें।
पूजा सेवा
Baba Biteshwarnath Temple, Bihta
बाबा बिटेश्वरनाथ के लिए पूजा सेवा देखें।
पूजा सेवा
Gupta Dham, Kaimur
कैमूर के पावन शिव तीर्थ से जुड़ी सेवा देखें।
दर्शन व सेवा
Harihar Nath Temple, Sonepur
हरिहरनाथ धाम की पूजा सेवा देखें।
पूजा सेवा
Mundeshwari Devi, Kaimur
शिव-शक्ति परंपरा से जुड़े धाम की सेवा देखें।
पूजा सेवानिपीत पञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमान शेखरं
महाकपालि सम्पदे शिरोजटालमस्तु नः ॥ ६ ॥
-द्धनञ्जयाहुतीकृत प्रचण्ड पञ्चसायके ।
धराधरेन्द्र नन्दिनी कुचाग्र चित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥ ७ ॥
कुहू निशीथिनी तमः प्रबन्ध बद्ध कन्धरः ।
निलिम्प निर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधान बन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥ ८ ॥
-वलम्बि कण्ठ कन्दली रुचि प्रबद्ध कन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥ ९ ॥
रसप्रवाह माधुरी विजृम्भणा मधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥ १० ॥
पूजन के भाव को अपनी साधना से जोड़ें
पूजा, चढ़ावा और धार्मिक सामग्री के कुछ विकल्प देखें।

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पूजन और चढ़ावे के लिए नारियल अर्पित करें।
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पूजन में श्रद्धा से लाल चुनरी अर्पित करें।
चढ़ावा अर्पित करें-द्विनिर्गमत् क्रमस्फुरत् कराल फालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन् मृदङ्ग तुङ्ग मङ्गल-
-ध्वनिक्रम प्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥ ११ ॥
-र्गरिष्ठ रत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्ष पक्षयोः ।
तृणारविन्द चक्षुषोः प्रजामही महेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥ १२ ॥
विमुक्त दुर्मतिः सदा शिरस्थमञ्जलिं वहन् ।
विलोल लोललोचनो ललामफाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥ १३ ॥
पठन् स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥ १४ ॥
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्र तुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥ १५ ॥
पाठ-परंपरा
परंपरागत संबद्धता: प्रचलित पाठ-परंपरा में शिव ताण्डव स्तोत्र को रावणकृत कहा जाता है। उपलब्ध पाठों में शब्द-विन्यास, सन्धि और कुछ पंक्तियों में छोटे पाठांतर मिल सकते हैं। यहाँ 15-श्लोक वाला व्यापक रूप से प्रचलित पाठ प्रस्तुत किया गया है।
श्लोकों की संख्या: कुछ संकलनों में अतिरिक्त या विस्तृत श्लोक-रूप भी मिलते हैं। इसलिए अलग पुस्तकों में संख्या और पाठ में अंतर दिखाई दे सकता है।
कॉपीराइट नोट: प्राचीन/परंपरागत संस्कृत पाठ और किसी आधुनिक पुस्तक का संपादन, अनुवाद, टीका या चित्र अलग-अलग अधिकारों के अधीन हो सकते हैं। इस पृष्ठ के हिन्दी और English भावार्थ स्वतंत्र रूप से लिखे गए हैं। ऊपर प्रयुक्त नटराज चित्र के साथ उसके लाइसेंस के अनुसार attribution दिया गया है।
शिव ताण्डव स्तोत्र का पाठ कैसे करें?
- स्वच्छ और शांत स्थान पर भगवान शिव का स्मरण करके पाठ करें।
- “ॐ नमः शिवाय” का जप करके स्तोत्र का पाठ आरंभ किया जा सकता है।
- उच्चारण स्पष्ट रखें और कठिन संस्कृत शब्दों को धीरे-धीरे पढ़ें।
- प्रदोष, सोमवार, शिवरात्रि या नियमित शिव-उपासना के समय इसका पाठ किया जा सकता है।
- पाठ को भक्ति, विनय, वैराग्य और आत्मचिन्तन की साधना के रूप में समझना अधिक उचित है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शिव ताण्डव स्तोत्र किसने लिखा है?
परंपरागत रूप से इसे रावणकृत शिव ताण्डव स्तोत्र कहा जाता है।
शिव ताण्डव स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?
यहाँ 15-श्लोक वाला प्रचलित पाठ प्रस्तुत किया गया है। विभिन्न संकलनों में विस्तृत पाठांतर भी मिलते हैं।
शिव ताण्डव स्तोत्र का पहला श्लोक कौन सा है?
“जटाटवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले...” से इसका पहला श्लोक आरंभ होता है।
शिव ताण्डव स्तोत्र का मुख्य भाव क्या है?
इसमें भगवान शिव के ताण्डव, तेज, वैराग्य, समत्व और भक्तिभाव का प्रभावशाली वर्णन मिलता है।