श्री सूक्तम्
माँ महालक्ष्मी की दिव्य वैदिक स्तुति
धन, धान्य, ऐश्वर्य, सौभाग्य और जीवन के मंगल की प्रार्थना करने वाला प्राचीन वैदिक सूक्त। जानिए इसकी उत्पत्ति, ऋषि परंपरा, पौराणिक कथा, संपूर्ण 15 मंत्र और उनका अर्थ।
Shri Suktam
The Sacred Vedic Hymn to Goddess Lakshmi
An ancient Vedic hymn invoking Goddess Shri for abundance, nourishment, prosperity, harmony and lasting well-being. Explore its origin, traditional history, all fifteen verses and meanings.

श्री सूक्तम् का परिचय
Introduction to Shri Suktam
श्री सूक्तम् हिन्दू धर्म में माँ श्री अर्थात् महालक्ष्मी की उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण वैदिक स्तोत्र है। यह ऋग्वेद की खिल परंपरा से संबंधित है। इसमें जातवेदा अग्निदेव से प्रार्थना की गई है कि वे देवी लक्ष्मी को उपासक के घर में लेकर आएँ।
इस सूक्त में देवी को हिरण्यवर्णा, कमल पर विराजमान, चंद्रमा के समान प्रकाशमान, स्वर्णमयी और समस्त प्राणियों का पोषण करने वाली शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है।
श्री सूक्तम् केवल धन की प्राप्ति की प्रार्थना नहीं है। इसमें अन्न, पशुधन, परिवार, सत्य वाणी, यश, पोषण और स्थायी समृद्धि की कामना भी की गई है।
Shri Suktam is an important Vedic hymn dedicated to Shri, the divine goddess known widely as Mahalakshmi. It belongs to the Khila tradition associated with the Rigveda.
The hymn invokes Agni, addressed as Jatavedas, to bring Goddess Lakshmi into the worshipper's home. She is described as golden, radiant, lotus-associated and nourishing to all beings.
Its prayer extends beyond material wealth to food, family welfare, truthful speech, reputation, nourishment and lasting prosperity.
श्री सूक्तम् : एक दृष्टि में
इस पृष्ठ पर क्या पढ़ेंगे?
श्री सूक्तम् की उत्पत्ति और इतिहास
श्री सूक्तम् ऋग्वेद से जुड़ी खिल परंपरा का एक महत्वपूर्ण सूक्त है। खिल का अर्थ है मुख्य संहिता के साथ संरक्षित अतिरिक्त वैदिक मंत्र-संग्रह। इसलिए इसे ऋग्वेद की सामान्य शाकल संहिता के मुख्य सूक्तों में सीधे नहीं गिनना चाहिए।
इसकी परंपरा अत्यंत प्राचीन है। इसके मंत्रों में देवी श्री की उपासना, अग्नि के माध्यम से देवी का आवाहन, धन-धान्य की कामना और अलक्ष्मी से मुक्ति की प्रार्थना की गई है।
समय के साथ श्री सूक्तम् लक्ष्मी पूजा, दीपावली, अभिषेक और विभिन्न गृहस्थ अनुष्ठानों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
Shri Suktam belongs to the Khila tradition associated with the Rigveda. Khila hymns are supplementary Vedic compositions preserved alongside the principal Samhita tradition.
The hymn invokes Shri through Agni and prays for enduring prosperity, food, cattle, family well-being and the removal of misfortune.
Over time, it became an important part of Lakshmi worship, Diwali rituals and devotional practices across India.
श्री सूक्तम् के ऋषि और रचयिता कौन हैं?
वैदिक परंपरा में ऋषि मंत्रों के द्रष्टा माने जाते हैं। उन्हें आधुनिक अर्थ में साहित्यिक लेखक समझना उचित नहीं है। श्री सूक्तम् के प्राचीन खिल पाठ में किसी एक ऐतिहासिक मानव लेखक का नाम निश्चित रूप से स्थापित नहीं है।
परंपरागत विनियोगों में आनन्द, कर्दम और चिक्लीत के नाम मिलते हैं। कुछ परंपराओं में श्रीदा का नाम भी दिया जाता है। कर्दम और चिक्लीत का उल्लेख स्वयं सूक्त की 11वीं और 12वीं ऋचाओं में आता है।
In Vedic tradition, Rishis are regarded as seers of the mantras rather than authors in the modern literary sense. No single historical human author is firmly established for the surviving Khila hymn.
Traditional ritual attributions mention names such as Ananda, Kardama and Chiklita. Some ritual traditions also include Shrida. Kardama and Chiklita are mentioned within the hymn itself.
वैदिक ऋषि परंपरा
मंत्रों को ऋषियों द्वारा दृष्ट माना जाता है।
अधिष्ठात्री देवी
श्री अर्थात् माँ महालक्ष्मी इस सूक्त की मुख्य उपास्य शक्ति हैं।
जातवेदा
अग्निदेव से देवी लक्ष्मी को उपासक के समीप लाने की प्रार्थना है।
समुद्र मंथन से कैसे हुआ माँ महालक्ष्मी का प्राकट्य?
माँ लक्ष्मी के प्राकट्य की प्रसिद्ध पौराणिक कथा।
1. देवताओं का वैभव कम होना
पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण देवताओं का तेज और वैभव कम हो गया। असुरों की शक्ति बढ़ने लगी और देवता चिंतित हो गए।
2. भगवान विष्णु की सलाह
देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता माँगी। भगवान विष्णु ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने का उपाय बताया।
3. मंदराचल और वासुकी नाग
मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया। भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार लेकर पर्वत को आधार प्रदान किया।
4. चौदह रत्नों का प्राकट्य
समुद्र मंथन के दौरान अनेक दिव्य रत्न और वस्तुएँ प्रकट हुईं। इनमें ऐरावत, उच्चैःश्रवा, कौस्तुभ मणि, पारिजात, अमृत और अन्य दिव्य पदार्थों का वर्णन मिलता है।
5. माँ महालक्ष्मी का दिव्य प्राकट्य
समुद्र मंथन से देवी महालक्ष्मी कमल पर विराजमान होकर प्रकट हुईं। उनका स्वरूप दिव्य सौंदर्य, तेज और ऐश्वर्य से परिपूर्ण था।
6. भगवान विष्णु का वरण
देवी महालक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद देवताओं का वैभव और सम्मान पुनः स्थापित हुआ।
श्री सूक्तम् में माँ महालक्ष्मी के दिव्य स्वरूप
हिरण्यवर्णा
स्वर्ण के समान प्रकाशमान और दिव्य तेज से युक्त।
हरिणी
हिरणी के समान सुंदर, आकर्षक और मनोहर स्वरूप।
चन्द्रा
चंद्रमा के समान शीतल और प्रकाशमान।
पद्मिनी
कमल से जुड़ी पवित्रता और सौंदर्य का स्वरूप।
नित्यपुष्टा
सदैव पोषण और वृद्धि प्रदान करने वाली।
ईश्वरी सर्वभूतानाम्
समस्त प्राणियों की अधिष्ठात्री और कल्याणकारी शक्ति।
श्री सूक्तम् के संपूर्ण 15 मूल मंत्र
संस्कृत पाठ, हिंदी भावार्थ और English translation. प्रत्येक मंत्र को अलग से कॉपी भी कर सकते हैं।
मंत्र 1 – माँ लक्ष्मी का आवाहन
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१॥
Candrāṃ Hiraṇmayīṃ Lakṣmīṃ Jātavedo Ma Āvaha.
मंत्र 2 – स्थायी समृद्धि की प्रार्थना
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥२॥
Yasyāṃ Hiraṇyaṃ Vindeyaṃ Gām Aśvaṃ Puruṣān Aham.
मंत्र 3 – वैभव और प्रतिष्ठा
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥३॥
Śriyaṃ Devīm Upahvaye Śrīr Mā Devī Juṣatām.
मंत्र 4 – कमल पर विराजमान देवी
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥४॥
Padme Sthitāṃ Padmavarṇāṃ Tām Ihopahvaye Śriyam.
मंत्र 5 – अलक्ष्मी से मुक्ति
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥५॥
Tāṃ Padminīm Īṃ Śaraṇam Ahaṃ Prapadye 'Lakṣmīr Me Naśyatāṃ Tvāṃ Vṛṇe.
मंत्र 6 – बिल्व वृक्ष का महत्व
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥६॥
Tasya Phalāni Tapasā Nudantu Māyāntarāyāś Ca Bāhyā Alakṣmīḥ.
मंत्र 7 – यश और कीर्ति की प्राप्ति
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥७॥
Prādurbhūto'smi Rāṣṭre'smin Kīrtim Ṛddhiṃ Dadātu Me.
मंत्र 8 – दरिद्रता और अभाव का नाश
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥८॥
Abhūtim Asamṛddhiṃ Ca Sarvāṃ Nirṇuda Me Gṛhāt.
मंत्र 9 – समस्त प्राणियों का पोषण
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥९॥
Īśvarīṃ Sarvabhūtānāṃ Tām Ihopahvaye Śriyam.
मंत्र 10 – सत्य वाणी और शुभ संकल्प
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥१०॥
Paśūnāṃ Rūpam Annasya Mayi Śrīḥ Śrayatāṃ Yaśaḥ.
मंत्र 11 – परिवार में माँ लक्ष्मी का निवास
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥११॥
Śriyaṃ Vāsaya Me Kule Mātaraṃ Padmamālinīm.
मंत्र 12 – गृहस्थ जीवन में सुख और पोषण
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥१२॥
Ni Ca Devīṃ Mātaraṃ Śriyaṃ Vāsaya Me Kule.
मंत्र 13 – कमलमालिनी माँ लक्ष्मी
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१३॥
Candrāṃ Hiraṇmayīṃ Lakṣmīṃ Jātavedo Ma Āvaha.
मंत्र 14 – सूर्य के समान तेजस्विनी देवी
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१४॥
Sūryāṃ Hiraṇmayīṃ Lakṣmīṃ Jātavedo Ma Āvaha.
मंत्र 15 – स्थायी लक्ष्मी और पूर्ण समृद्धि
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्॥१५॥
Yasyāṃ Hiraṇyaṃ Prabhūtaṃ Gāvo Dāsyo'śvān Vindeyaṃ Puruṣān Aham.
श्री सूक्तम् की फलश्रुति
प्रचलित पाठ में 15 ऋचाओं के बाद आने वाले कुछ अतिरिक्त मंत्र।
1. पाठ का विधान
श्रियः पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥
भावार्थ: जो व्यक्ति पवित्र और संयमित होकर श्री की कामना करता है, वह श्रद्धापूर्वक घृत की आहुति देते हुए पंद्रह ऋचाओं का नियमित पाठ करे।
2. माँ पद्माक्षी से प्रार्थना
त्वं मां भजस्व पद्माक्षी येन सौख्यं लभाम्यहम्॥
भावार्थ: हे कमल के समान मुख, जंघाओं और नेत्रों वाली, कमल से प्रकट होने वाली देवी! आप मुझ पर कृपा करें, जिससे मुझे सुख और कल्याण प्राप्त हो।
3. धन और गौधन की प्रार्थना
धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे॥
भावार्थ: हे देवी! आप अश्व, गौधन और संपत्ति प्रदान करने वाली हैं। मुझ पर प्रसन्न होकर धन और शुभ कामनाओं की पूर्ति करें।
4. परिवार और दीर्घायु की प्रार्थना
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु माम्॥
भावार्थ: हे माता! आप परिवार, संतान, धन, धान्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री हैं। मुझे दीर्घायु और कल्याण प्रदान करें।
5. देवशक्तियों में धन का स्वरूप
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमश्नुते॥
भावार्थ: अग्नि, वायु, सूर्य, वसु, इंद्र, बृहस्पति और वरुण आदि दिव्य शक्तियों में धन और ऐश्वर्य का स्वरूप निहित है।
6. सोम से प्रार्थना
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः॥
भावार्थ: सोम के माध्यम से देवशक्तियों का स्मरण करते हुए धन और कल्याण की कामना की गई है।
7. सद्गुणों की प्राप्ति
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जपेत्सदा॥
भावार्थ: जो पुण्यात्मा भक्त नियमित रूप से श्री सूक्तम् का जप करते हैं, उनमें क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और अशुभ विचार नहीं रहने चाहिए।
श्री सूक्तम् का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
धन और ऐश्वर्य
स्थायी संपत्ति, संसाधन और जीवन में समृद्धि की कामना।
अन्न और पोषण
भोजन, जल, कृषि और सभी जीवों के पोषण का महत्व।
परिवार का कल्याण
गृहस्थ जीवन और परिवार में मंगल की प्रार्थना।
यश और प्रतिष्ठा
समाज और राष्ट्र में सम्मान तथा कीर्ति की कामना।
सत्य वाणी
सत्य, अच्छे संकल्प और नैतिक जीवन का महत्व।
अलक्ष्मी से मुक्ति
अभाव, भूख, प्यास और अमंगल दूर होने की प्रार्थना।
अलक्ष्मी कौन हैं?
श्री सूक्तम् में माँ लक्ष्मी के साथ अलक्ष्मी से मुक्ति की प्रार्थना भी की गई है। अलक्ष्मी को परंपरा में दरिद्रता, अभाव, भूख, प्यास और अव्यवस्था के प्रतीक के रूप में समझा जाता है।
सूक्त की पाँचवीं और आठवीं ऋचा में अलक्ष्मी के नाश की प्रार्थना है। इसका आध्यात्मिक संदेश है कि जीवन में केवल धन ही नहीं, बल्कि स्वच्छता, संतोष, पोषण और शुभ विचार भी आवश्यक हैं।
Alakshmi represents misfortune, want, hunger, thirst and disorder in traditional interpretations. The hymn asks that these conditions depart so that Shri may dwell in the home.
Its deeper message is that true prosperity requires more than money: nourishment, contentment, purity and positive conduct are equally important.
श्री सूक्तम् में बिल्व वृक्ष का महत्व
श्री सूक्तम् के छठे मंत्र में बिल्व वृक्ष का विशेष उल्लेख है। बिल्व भारतीय धार्मिक परंपरा में पवित्र वृक्ष माना जाता है। इसके पत्ते भगवान शिव की पूजा में विशेष रूप से अर्पित किए जाते हैं।
इस मंत्र में बिल्व वृक्ष के फल से आंतरिक बाधाओं और बाहरी अलक्ष्मी को दूर करने की प्रार्थना की गई है। यह प्रकृति और मानव जीवन के कल्याण के बीच संबंध को दर्शाता है।
The sixth verse of Shri Suktam refers to the Bilva tree. Its fruits are invoked symbolically as a means of removing inner obstacles and outward misfortune.
Bilva is also sacred in Hindu worship, particularly in offerings to Lord Shiva.
श्री सूक्तम् का पाठ कैसे करें?
1. शुद्धता
स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान साफ रखें।
2. दीप प्रज्वलन
माँ लक्ष्मी के सामने घी का दीपक जलाएँ।
3. पूजन
पुष्प, अक्षत और उपलब्ध पूजन सामग्री अर्पित करें।
4. गणेश स्मरण
पाठ आरंभ करने से पहले भगवान गणेश का स्मरण करें।
5. मंत्र पाठ
15 मुख्य ऋचाओं का धीरे और स्पष्ट उच्चारण के साथ पाठ करें।
6. प्रार्थना
परिवार, समाज और सभी के कल्याण की प्रार्थना करें।
श्री सूक्तम् का पाठ कब करें?
| अवसर | धार्मिक परंपरा |
|---|---|
| शुक्रवार | माँ लक्ष्मी की विशेष उपासना। |
| दीपावली | महालक्ष्मी पूजन के समय। |
| धनतेरस | धन और ऐश्वर्य की मंगल कामना। |
| शरद पूर्णिमा | कुछ परंपराओं में विशेष लक्ष्मी आराधना। |
| वरलक्ष्मी व्रत | दक्षिण भारत की लक्ष्मी उपासना परंपरा। |
| प्रतिदिन | नियमित व्यक्तिगत भक्ति और साधना। |
श्री सूक्तम् और महालक्ष्मी अष्टकम् में अंतर
| विषय | श्री सूक्तम् | महालक्ष्मी अष्टकम् |
|---|---|---|
| स्वरूप | वैदिक सूक्त | स्तोत्र |
| परंपरा | ऋग्वेद खिल | इंद्रकृत स्तोत्र परंपरा |
| संरचना | 15 मुख्य ऋचाएँ | 8 मुख्य श्लोक |
| मुख्य विषय | श्री तत्व और समृद्धि | महालक्ष्मी की स्तुति |
| उपासना | वैदिक पूजा एवं हवन | भक्ति एवं स्तुति |
श्री सूक्तम् से जुड़े सामान्य प्रश्न
श्री सूक्तम् में कितने मंत्र हैं?
प्रचलित मूल पाठ में 15 मुख्य ऋचाएँ हैं। फलश्रुति और अन्य अतिरिक्त मंत्रों को जोड़ने पर अलग-अलग पुस्तकों में संख्या अधिक हो सकती है।
श्री सूक्तम् किस वेद से संबंधित है?
यह ऋग्वेद की खिल परंपरा से संबंधित है। इसे मुख्य शाकल संहिता के नियमित सूक्तों में सीधे शामिल नहीं किया जाता।
श्री सूक्तम् के रचयिता कौन हैं?
इसका कोई एक निश्चित ऐतिहासिक मानव लेखक प्रमाणित नहीं है। परंपरागत विनियोगों में आनन्द, कर्दम और चिक्लीत आदि के नाम मिलते हैं।
श्री सूक्तम् किस देवी को समर्पित है?
यह देवी श्री अर्थात् माँ महालक्ष्मी की वैदिक स्तुति है।
क्या श्री सूक्तम् प्रतिदिन पढ़ सकते हैं?
हाँ। व्यक्तिगत भक्ति और साधना के लिए श्रद्धापूर्वक नियमित पाठ किया जा सकता है।
श्री सूक्तम् का पाठ किस दिन करना चाहिए?
शुक्रवार, दीपावली, धनतेरस और अन्य लक्ष्मी पूजन के अवसरों पर इसका पाठ विशेष रूप से प्रचलित है।
क्या महिलाएँ श्री सूक्तम् पढ़ सकती हैं?
सामान्य भक्ति और व्यक्तिगत उपासना में महिलाएँ भी इसका पाठ कर सकती हैं। विशेष वैदिक अनुष्ठान में अपनी परंपरा के आचार्य से मार्गदर्शन लें।
श्री सूक्तम् में अलक्ष्मी कौन हैं?
अलक्ष्मी को परंपरा में दरिद्रता, भूख, प्यास, अभाव और अमंगल का प्रतीक माना जाता है।
श्री सूक्तम् में बिल्व वृक्ष का उल्लेख क्यों है?
छठे मंत्र में बिल्व वृक्ष के फलों से आंतरिक बाधाओं और बाहरी अलक्ष्मी को दूर करने की प्रार्थना की गई है।
क्या श्री सूक्तम् और लक्ष्मी चालीसा एक ही हैं?
नहीं। श्री सूक्तम् वैदिक सूक्त है, जबकि लक्ष्मी चालीसा भक्ति परंपरा की चालीस चौपाइयों वाली रचना है।
अलग-अलग पुस्तकों में श्री सूक्तम् के मंत्रों की संख्या अलग क्यों है?
मुख्य पाठ की 15 ऋचाओं के अतिरिक्त फलश्रुति और पूजन मंत्र अलग-अलग परंपराओं में जोड़े जाते हैं। इसी कारण कुछ संस्करणों में 16, 25 या अधिक मंत्र मिलते हैं।
धन के साथ संतोष हो,
वैभव के साथ विनम्रता हो,
वाणी में सत्य हो और कर्म में पवित्रता हो।
यही श्री तत्व की व्यापक आध्यात्मिक भावना है।
माँ महालक्ष्मी की कृपा सभी पर बनी रहे
भारतीय सनातन परंपरा, वैदिक ज्ञान और आध्यात्मिक विरासत को जानें और आगे बढ़ाएँ।
SANATANA BIHARInspired by the Sacred Heritage of Bihar
