भवानी अष्टकम्Bhavani AshtakamBhavani Ashtakam
माँ भवानी की शरणागति, भक्ति और करुणा का भावपूर्ण अष्टक — “आप ही मेरी गति हैं” का सरल और गहरा संदेश।An eight-verse hymn of surrender, devotion and refuge in Mother Bhavani, centred on the prayer: You alone are my refuge.

भवानी अष्टकम्Mother Bhavani
Bhavani Ashtakam
भवानी अष्टकम् क्या है?What is Bhavani Ashtakam?
भवानी अष्टकम् माँ भवानी को समर्पित आठ श्लोकों का प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है। इसके प्रत्येक श्लोक में भक्त अपनी सीमाओं और सांसारिक सहारों की अस्थिरता को स्वीकार करते हुए बार-बार माँ से कहता है — “गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि” — हे भवानी, आप ही मेरी गति और एकमात्र शरण हैं।
Bhavani Ashtakam is a well-known eight-verse Sanskrit hymn dedicated to Mother Bhavani. Each verse expresses humility and surrender and returns to the refrain that Bhavani alone is the devotee's refuge.
ग्रंथ एवं रचना-परंपराText & Traditional Attribution
परंपरागत रचयिता: आदि शंकराचार्य। यह स्तोत्र पारंपरिक रूप से उनके नाम से संबद्ध आठ-श्लोकीय रचना के रूप में मिलता है। उपलब्ध मुद्रित पाठ-संदर्भ में “श्रीमदादिशङ्कराचार्यविरचितं भवान्यष्टकम्” जैसा समापन भी मिलता है।
Traditional attribution: Adi Shankaracharya. The hymn is traditionally transmitted as an eight-verse composition associated with his name, and printed/textual versions carry a concluding attribution to Shankaracharya.
भवानी अष्टकम् का भाव और संदेशThe Devotional Message
इस अष्टक का मूल भाव पूर्ण शरणागति है। भक्त पहले परिवार, विद्या, आजीविका और अन्य सांसारिक सहारों की सीमाओं को स्वीकार करता है। आगे वह अपनी साधना की कमी और अपने दोषों को भी स्वीकार करता है। अंततः उसकी प्रार्थना एक ही बिन्दु पर आ जाती है — माँ भवानी ही अंतिम शरण हैं।
The central mood is complete surrender. The devotee acknowledges the limitations of worldly supports, admits shortcomings in spiritual practice and finally rests in one prayer: Mother Bhavani alone is the ultimate refuge.
रचना की कथा के बारे मेंAbout the Composition Tradition
आदि शंकराचार्य के जीवन की किसी विशेष घटना से भवानी अष्टकम् की रचना को जोड़ने वाली कई लोकप्रिय कथाएँ मिलती हैं, लेकिन इनके लिए एकसमान प्राचीन प्राथमिक प्रमाण स्पष्ट नहीं है। इसलिए यहाँ ऐसी कथाओं को निश्चित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं रखा गया है। सुरक्षित रूप से इतना कहा जा सकता है कि यह स्तोत्र परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य से संबद्ध है और इसका मुख्य संदेश देवी के प्रति पूर्ण शरणागति है।
Various popular stories connect the composition with particular episodes in Shankaracharya's life, but a single early primary source for those stories is not clearly established. This page therefore presents the traditional attribution while avoiding unsupported historical claims.
सम्पूर्ण पाठ — ८ श्लोकComplete Text — 8 Verses
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ १ ॥
पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः ।
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ २ ॥
न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ३ ॥
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मात-
र्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ४ ॥
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माँ ताराचंडी के पावन शक्तिपीठ में पूजा सेवा अर्पित करें।
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Maa Van Devi, Bihta
माँ वन देवी की आराधना से जुड़ी पूजा सेवा श्रद्धा से बुक करें।
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Maa Thawe Bhawani, Gopalganj
माँ थावे भवानी के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करें।
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कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ५ ॥
दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् ।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ६ ॥
जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये ।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ७ ॥
महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः ।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रनष्टः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ८ ॥
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माँ के श्रृंगार और सिंदूर अर्पण का पावन चढ़ावा।
चढ़ावा अर्पित करें →पाठ के समय ध्यान रखने योग्य बातेंHelpful Reading Guidance
- पाठ से पहले माँ भवानी का स्मरण करके मन को शांत करें।
- प्रत्येक श्लोक में व्यक्त शरणागति और विनम्रता के भाव को समझते हुए पाठ करें।
- प्रातः या सायंकाल शांत वातावरण में श्रद्धा से इसका पाठ किया जा सकता है।
- नवरात्रि, शुक्रवार, देवी-उपासना या व्यक्तिगत प्रार्थना के अवसर पर इसका पाठ किया जाता है; किसी विशेष सांसारिक परिणाम की गारंटी के रूप में इसे न लें।
- Begin by remembering Mother Bhavani and settling the mind.
- Recite with attention to the humility and surrender expressed in each verse.
- The hymn may be recited in a calm setting in the morning or evening.
- It is traditionally used in Devi devotion and personal prayer; it should not be treated as a guarantee of a specific worldly result.
प्रामाणिक पाठ-संदर्भText Reference
मुद्रित पाठ-संदर्भ: प्रभात स्तोत्रनिधि (देवनागरी) में श्री भवानी अष्टकम् का यह आठ-श्लोकीय पाठ मुद्रित है। उपलब्ध संस्करण के अंत में “इति श्री भवान्यष्टकम्” दिया गया है।
Printed text reference: The eight-verse Bhavani Ashtakam is printed in Prabhata Stotranidhi (Devanagari), with the text concluding with “iti śrī bhavānyaṣṭakam.”
रचना-परंपरा: स्तोत्र को परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य से संबद्ध किया जाता है। लोकप्रिय जीवन-कथाओं को बिना पर्याप्त प्राथमिक प्रमाण के निश्चित ऐतिहासिक घटना के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
Traditional attribution: The hymn is traditionally associated with Adi Shankaracharya. Popular biographical stories are not presented here as established historical facts without adequate primary evidence.