गणेश चतुर्थी 2026 सोमवार, 14 सितंबर को मनाई जाएगी। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 14 सितंबर की सुबह लगभग 7:06 बजे शुरू होकर 15 सितंबर की सुबह 7:44 बजे तक रहेगी। पटना के लिए गणेश पूजा का मध्याह्न मुहूर्त लगभग सुबह 10:31 बजे से दोपहर 12:59 बजे तक है। स्थानीय पंचांग के अनुसार कुछ मिनट का अंतर संभव है।
भारत में गणेश चतुर्थी को भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। वे गणपति, विनायक, विघ्नेश्वर और सिद्धिविनायक जैसे अनेक नामों से पूजित हैं और शुभारंभ, बुद्धि तथा विघ्नों के निवारण से जुड़े देवता माने जाते हैं। भारतीय कला और धार्मिक परंपरा में गणेश की पहचान हाथी-मुख, विशाल उदर और मूषक वाहन के साथ विकसित हुई है।
लेकिन बिहार के संदर्भ में गणेश चतुर्थी की कहानी केवल महाराष्ट्र के भव्य गणेशोत्सव तक सीमित नहीं है।
बिहार में गणपति आराधना अपने स्थानीय रंग, घरेलू पूजा, मंदिरों, सामुदायिक उत्सवों और विशेष रूप से मिथिला की ‘चौरचन’ परंपरा के साथ एक अलग सांस्कृतिक रूप धारण करती है।
यही इसे Sanatana Bihar की दृष्टि से देखने का विशेष कारण है।
गणेश चतुर्थी क्या है?
गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला प्रमुख हिंदू पर्व है।
सनातन परंपरा में भगवान गणेश को मंगलारंभ और विघ्न-विनाश से जोड़ा जाता है। किसी शुभ कार्य, पूजा, यात्रा, विवाह, गृहप्रवेश या नए कार्य की शुरुआत से पहले गणेश वंदना करने की परंपरा इसी भाव को व्यक्त करती है।
कला इतिहास में भी गणेश को “Lord of Beginnings” और बाधाओं को दूर करने वाले देवता के रूप में वर्णित किया गया है।
गणेश चतुर्थी पर भक्त घरों और सार्वजनिक स्थानों पर गणेश प्रतिमा स्थापित करते हैं। पूजा, आरती, भजन और प्रसाद के बाद स्थानीय परंपरा के अनुसार प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
गणेशोत्सव की अवधि हर स्थान पर समान नहीं होती। कहीं यह एक-दो दिन का घरेलू पर्व होता है, कहीं कई दिनों तक चलता है और अनेक सार्वजनिक उत्सव अनंत चतुर्दशी तक चलते हैं।
भगवान गणेश की पौराणिक कथा
भगवान गणेश के जन्म की कथा के अनेक रूप पुराणिक और लोक परंपराओं में मिलते हैं।
सबसे प्रसिद्ध कथा के अनुसार, माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण किया और उसमें प्राण प्रतिष्ठित किए। उन्होंने गणेश को अपने द्वार की रक्षा का दायित्व दिया।
जब भगवान शिव वहाँ पहुँचे, तो गणेश ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। शिव और गणेश के बीच संघर्ष हुआ और शिव ने क्रोध में गणेश का मस्तक अलग कर दिया।
माता पार्वती के दुःख और क्रोध के बाद भगवान शिव ने गणेश को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया और हाथी का मस्तक लगाकर उन्हें नया जीवन दिया।
ब्रिटिश म्यूज़ियम भी गणेश की एक प्रमुख परंपरागत कथा में उन्हें पार्वती से उत्पन्न और शिव-पार्वती के पुत्र के रूप में वर्णित करता है।
यही कथा गणेश के गजानन स्वरूप की धार्मिक और सांस्कृतिक व्याख्या का आधार बनती है।
गणेश को सबसे पहले क्यों पूजा जाता है?
गणेश को अग्रपूज्य माना जाता है।
इसके पीछे भी अनेक धार्मिक कथाएँ हैं। एक प्रसिद्ध कथा में देवताओं के बीच यह प्रश्न उठा कि सबसे पहले किसकी पूजा की जानी चाहिए। गणेश ने अपने माता-पिता—शिव और पार्वती—की परिक्रमा करके यह बताया कि उनके लिए माता-पिता ही सम्पूर्ण जगत हैं।
उनकी बुद्धि और विवेक से प्रभावित होकर उन्हें अग्रपूज्य होने का सम्मान मिला।
इसीलिए आज भी किसी शुभ कार्य के आरंभ में—
“श्री गणेशाय नमः”
लिखने या गणेश का स्मरण करने की परंपरा व्यापक है।
यह केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में बुद्धि से शुरुआत करने का प्रतीक भी है।
गणेश: बुद्धि, सिद्धि और विघ्न-विनाश के देवता
भगवान गणेश के अनेक रूप और नाम हैं।
उन्हें—
- विघ्नहर्ता — बाधाओं को दूर करने वाला
- सिद्धिविनायक — सिद्धि प्रदान करने वाला
- बुद्धिप्रिय — बुद्धि से संबंधित
- गणपति — गणों के स्वामी
- एकदंत — एक दाँत वाले
- लंबोदर — विशाल उदर वाले
- विनायक — मार्गदर्शक/श्रेष्ठ नायक
के रूप में जाना जाता है।
गणेश की लोकप्रियता केवल धार्मिक पूजा तक सीमित नहीं रही। भारतीय कला में उनकी प्रतिमाएँ सदियों के दौरान विकसित होती गईं। ब्रिटिश म्यूज़ियम के अनुसार हाथी-मुख, मूषक वाहन और अन्य विशिष्ट प्रतीकों के साथ गणेश भारतीय धार्मिक कला में अत्यंत पहचानने योग्य देवता बन चुके हैं।
गणेश चतुर्थी का इतिहास: घरेलू पूजा से सार्वजनिक उत्सव तक
गणेश की पूजा प्राचीन भारतीय धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, लेकिन आज जिस सार्वजनिक गणेशोत्सव की छवि सबसे अधिक प्रसिद्ध है, उसका आधुनिक विस्तार विशेष रूप से महाराष्ट्र में हुआ।
भारत सरकार के Incredible India portal के अनुसार, 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेश चतुर्थी को बड़े सार्वजनिक उत्सव के रूप में संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका उद्देश्य धार्मिक उत्सव के माध्यम से सामाजिक एकता और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ाना भी था।
इससे गणेश चतुर्थी का एक नया सार्वजनिक रूप विकसित हुआ—
घर के गणपति से सार्वजनिक गणपति तक।
पंडाल, सामूहिक आरती, संगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और शोभायात्राएँ इस आधुनिक गणेशोत्सव का हिस्सा बने।
लेकिन यह समझना जरूरी है कि गणेश पूजा स्वयं 1893 में शुरू नहीं हुई थी।
तिलक ने मुख्यतः सार्वजनिक उत्सव के आधुनिक स्वरूप को लोकप्रिय बनाया।
बिहार में गणेश चतुर्थी
बिहार की धार्मिक संस्कृति बहुस्तरीय है। यहाँ किसी पर्व का स्वरूप पूरे राज्य में एक जैसा होना आवश्यक नहीं है।
एक ओर पटना जैसे शहरों में सार्वजनिक गणेश उत्सवों और पंडालों की परंपरा दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर गाँवों और कस्बों में घर, मंदिर और स्थानीय पूजा समितियाँ गणेश आराधना का केंद्र बनती हैं।
2025 में पटना में महाराष्ट्र मंडल सहित विभिन्न स्थानों पर सार्वजनिक गणेश उत्सव आयोजित हुए। महाराष्ट्र मंडल के उत्सव में छह फुट की गणेश प्रतिमा स्थापित की गई और सामूहिक आरती तथा धार्मिक कार्यक्रम आयोजित हुए।
गया में भी 2025 में मंदिरों, घरों और पंडालों में गणेश चतुर्थी के आयोजन दर्ज किए गए।
बेगूसराय के बीहट में गणेश भवन का छह दिवसीय श्रीगणेश जन्मोत्सव लगभग 150 वर्षों से मनाए जाने की स्थानीय परंपरा दर्ज की गई है।
इस तरह बिहार में गणपति आराधना केवल हाल के वर्षों में आया शहरी उत्सव नहीं है; राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी अपनी स्थानीय परंपराएँ और सामुदायिक रूप दिखाई देते हैं।
मिथिला की विशिष्ट परंपरा: चौरचन या चौठचंद्र
बिहार की गणेश चतुर्थी परंपरा की सबसे विशिष्ट कड़ी मिथिला का चौरचन/चौठचंद्र पर्व है।
यह इस बात का सुंदर उदाहरण है कि एक ही तिथि के आसपास अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक परंपराएँ किस प्रकार स्थानीय संस्कृति के साथ अपना विशिष्ट स्वरूप ग्रहण करती हैं।
मिथिला में चौरचन के अवसर पर चंद्रमा की पूजा और अर्घ्य का विशेष महत्व है। 2026 में चौरचन भी 14 सितंबर को पड़ रहा है।
इस दिन परिवार आँगन में एकत्र होते हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा निभाते हैं।
इसमें स्थानीय अरिपन, फल, पकवान और पारंपरिक पूजा-सामग्री का विशेष स्थान है। मिथिला की यह परंपरा गणेश चतुर्थी के अवसर को बिहार की स्थानीय सांस्कृतिक पहचान से जोड़ती है।
यही वह बिंदु है जहाँ बिहार की सनातन परंपरा केवल किसी बाहरी उत्सव की नकल नहीं रहती, बल्कि अपनी स्थानीय स्मृति और लोकाचार के साथ एक नया रूप लेती है।
गणेश चतुर्थी और मिथिला का चंद्र-संबंध
चौरचन की परंपरा में चंद्रमा का विशेष महत्व है।
इसके पीछे मिथ्या कलंक से जुड़ी धार्मिक कथा और श्रीकृष्ण-स्यमंतक मणि की कथा का संबंध बताया जाता है।
लोकमान्यता के अनुसार गणेश और चंद्रमा के बीच हुई एक घटना के कारण गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रदर्शन को लेकर विशेष सावधानी की परंपरा विकसित हुई।
यही विश्वास आगे चलकर मिथिला के चौरचन पर्व की सांस्कृतिक स्मृति से जुड़ता है।
इसलिए बिहार में गणेश चतुर्थी का अध्ययन केवल गणेश पूजा तक सीमित नहीं होना चाहिए।
यह गणेश, चंद्रमा, मिथिला, अरिपन और लोक-स्मृति के बीच संबंध को समझने का अवसर भी है।
पूजा में दूर्वा का महत्व
भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा घास का विशेष स्थान है।
गणेश को दूर्वा अर्पित करना एक प्रचलित धार्मिक परंपरा है। विभिन्न क्षेत्रों में इसकी संख्या और अर्पण की विधि अलग-अलग हो सकती है, इसलिए किसी एक स्थानीय विधि को सार्वभौमिक नियम मानना उचित नहीं है।
दूर्वा का महत्व गणेश की पूजा में इतना गहरा है कि यह उनकी पूजा की सबसे पहचानने योग्य सामग्रियों में शामिल हो गई है।
यह परंपरा हमें भारतीय पूजा-पद्धति की एक महत्वपूर्ण विशेषता भी दिखाती है—
प्रकृति की साधारण वस्तुएँ भी धार्मिक प्रतीक बन सकती हैं।
मोदक और गणेश चतुर्थी
गणेश चतुर्थी की बात हो और मोदक का उल्लेख न हो, ऐसा संभव नहीं।
गणेश की प्रतिमाओं में हाथ में मिठाई या मोदक का पात्र भारतीय कला में लंबे समय से दिखाई देता है। गणेश को मधुर प्रसाद अर्पित करने की परंपरा भी व्यापक है।
हालाँकि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में गणेश चतुर्थी का प्रसाद अलग हो सकता है।
यही क्षेत्रीय विविधता भारतीय संस्कृति की विशेषता है।
महाराष्ट्र में उकडीचे मोदक प्रसिद्ध हैं, जबकि उत्तर भारत और बिहार में लड्डू, फल और स्थानीय घरेलू पकवानों का उपयोग भी देखने को मिलता है।
एक देवता—अनेक क्षेत्रीय स्वाद।
बिहार की लोक-संस्कृति और गणेश उत्सव
बिहार की संस्कृति में धार्मिक अवसरों के साथ भजन, कीर्तन, लोकगीत और सामुदायिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की लंबी परंपरा है।
बिहार सरकार के पर्यटन विभाग के अनुसार, धार्मिक आयोजनों में भजनीया और कीर्तनिया परंपराएँ लोकप्रिय रही हैं तथा संगीत और लोककला राज्य के सामाजिक और धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
गणेश उत्सव में भी यही सांस्कृतिक प्रवाह दिखाई देता है।
2025 में बेगूसराय के गणेश उत्सवों में पूजा के साथ मेले, सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत और सामुदायिक भागीदारी दर्ज हुई।
इसलिए गणेश उत्सव को केवल प्रतिमा स्थापना कहना अधूरा होगा।
यह धर्म + कला + संगीत + समुदाय का सम्मिलित उत्सव भी है।
बिहार की मिट्टी और गणेश प्रतिमा
बिहार की कला परंपरा में मिट्टी, लकड़ी, बाँस, सिक्की और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों से बनी वस्तुओं का महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
बिहार पर्यटन विभाग राज्य की पारंपरिक कलाओं में clay pottery, bamboo work, sikki work, brass work, wood carving और Madhubani painting जैसी विविध शिल्प परंपराओं को रेखांकित करता है।
गणेश चतुर्थी के संदर्भ में यह एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रश्न भी उठाता है—
क्या हमारा उत्सव हमारी स्थानीय कला को भी जीवित रख रहा है?
मिट्टी की प्रतिमा, स्थानीय सजावट, प्राकृतिक फूल और पारंपरिक हस्तशिल्प का उपयोग त्योहार को स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ सकता है।
गणेश चतुर्थी और पर्यावरण
परंपरागत रूप से गणेश प्रतिमाएँ मिट्टी जैसी प्राकृतिक सामग्री से बनाई जाती थीं।
आज बड़े सार्वजनिक उत्सवों के साथ प्रतिमाओं का आकार और सजावट दोनों बढ़े हैं। इसलिए प्रतिमा निर्माण और विसर्जन में पर्यावरणीय प्रभाव पर ध्यान देना भी आवश्यक है।
प्राकृतिक मिट्टी की प्रतिमा, प्राकृतिक रंग और स्थानीय सामग्री का उपयोग धार्मिक परंपरा और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच बेहतर संतुलन बना सकता है।
Incredible India भी गणेश चतुर्थी को धार्मिक उत्सव के साथ cultural unity और environmental awareness से जोड़ता है।
यह आधुनिक समय में सनातन परंपरा की एक महत्वपूर्ण व्याख्या हो सकती है—
परंपरा को बचाना और प्रकृति का सम्मान करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
घर के गणपति से सार्वजनिक गणपति तक
बिहार में गणेश चतुर्थी के दो रूप साथ-साथ दिखाई देते हैं।
घर का गणपति
परिवार घर में गणेश प्रतिमा स्थापित करता है।
पूजा होती है।
आरती होती है।
बच्चे प्रसाद और सजावट में शामिल होते हैं।
यह रूप पारिवारिक संस्कार को आगे बढ़ाता है।
सार्वजनिक गणपति
स्थानीय समितियाँ प्रतिमा स्थापित करती हैं।
पंडाल सजते हैं।
सामूहिक आरती होती है।
भजन और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।
समुदाय एक साथ आता है।
यह रूप सामुदायिक संस्कृति को मजबूत करता है।
पटना और बेगूसराय में हाल के वर्षों के आयोजन इन दोनों रूपों के अस्तित्व को स्पष्ट करते हैं।
परंपरा से आधुनिकता तक
आज गणेश चतुर्थी केवल मंदिर या घर तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर लाइव आरती होती है। प्रवासी परिवार वीडियो कॉल पर पूजा में शामिल होते हैं। स्थानीय कलाकार डिजिटल माध्यम से अपनी कला दिखाते हैं। युवा स्वयंसेवक आयोजन संभालते हैं।
लेकिन इन बदलावों के बीच पर्व का मूल भाव वही रहता है— शुभारंभ, बुद्धि, मंगल और विघ्न-विनाश। यही किसी जीवित संस्कृति की पहचान है। परंपरा का माध्यम बदल सकता है, लेकिन उसकी सांस्कृतिक स्मृति बनी रह सकती है।
बिहार के लिए गणेश चतुर्थी का विशेष अर्थ
बिहार को अक्सर बौद्ध, जैन, वैदिक, रामायण और लोकपरंपराओं की भूमि के रूप में याद किया जाता है। लेकिन बिहार की विरासत केवल उसके प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों में नहीं है।
बिहार पर्यटन विभाग स्वयं राज्य की पहचान को उसके लोकाचार, खानपान, उत्सव, संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत की विविधता से जोड़ता है।
गणेश चतुर्थी इसी जीवित संस्कृति का एक हिस्सा है। और मिथिला का चौरचन इसे और विशिष्ट बनाता है। यह दिखाता है कि बिहार की सनातन संस्कृति किसी एकरूप ढाँचे में नहीं बंधी।
मिथिला का अपना रंग है। मगध का अपना सांस्कृतिक स्वर है। भोजपुर का अपना लोकजीवन है। पटना की अपनी शहरी धार्मिक संस्कृति है। और इन सभी के बीच सनातन परंपरा अलग-अलग स्थानीय रूपों में जीवित रहती है।
गणेश चतुर्थी 2026: तिथि और पूजा मुहूर्त
पर्व: गणेश चतुर्थी / विनायक चतुर्थी
दिन: सोमवार, 14 सितंबर 2026
स्थान: बिहार/पटना के लिए स्थानीय पंचांग के अनुसार
चतुर्थी तिथि आरंभ: 14 सितंबर, लगभग 7:06 AM
चतुर्थी तिथि समाप्त: 15 सितंबर, लगभग 7:44 AM
पटना में गणेश पूजा मुहूर्त: लगभग 10:31 AM–12:59 PM
नोट: पूजा का स्थानीय मुहूर्त शहर और पंचांग-पद्धति के अनुसार कुछ मिनट बदल सकता है। इसलिए अंतिम पूजा समय स्थानीय पंचांग से मिलाना उचित है।
2026 में एक विशेष संयोग यह भी है कि हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी एक ही तारीख—14 सितंबर—को पड़ रहे हैं, क्योंकि तृतीया से चतुर्थी का संक्रमण उसी दिन हो रहा है। दोनों पर्व धार्मिक रूप से अलग हैं और उनकी अपनी-अपनी पूजा परंपराएँ हैं।
गणेश चतुर्थी: बिहार की जीवित सनातन विरासत
किसी संस्कृति की वास्तविक शक्ति केवल उसके प्राचीन ग्रंथों में नहीं होती।
वह तब जीवित रहती है जब— एक बच्चा पहली बार गणेश की आरती सीखता है। एक परिवार हर वर्ष घर में गणपति स्थापित करता है। एक कारीगर मिट्टी से गणेश की प्रतिमा बनाता है।
एक गाँव सामूहिक पूजा आयोजित करता है। एक मिथिला परिवार चौरचन के दिन आँगन में अरिपन बनाता है। और एक नई पीढ़ी इन सबको आधुनिक जीवन के साथ जोड़कर आगे ले जाती है।
यही living heritage है।
गणेश चतुर्थी हमें बताती है कि सनातन परंपरा स्थिर नहीं है। वह समय के साथ नए रूप ग्रहण करती है, लेकिन अपने मूल सांस्कृतिक भाव को आगे ले जाती है।
बिहार में गणपति आराधना इसी निरंतरता की एक सुंदर मिसाल है।
निष्कर्ष
गणेश चतुर्थी केवल भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करने का पर्व नहीं है।
यह बुद्धि और विवेक का उत्सव है। यह शुभारंभ का संस्कार है।
यह परिवार और समुदाय को जोड़ने वाला अवसर है।
यह भारतीय कला और शिल्प की अभिव्यक्ति है। और बिहार के संदर्भ में यह स्थानीय लोकपरंपराओं के साथ जुड़ती हुई सनातन विरासत है।
मिथिला का चौरचन हो, पटना के सार्वजनिक गणेश उत्सव हों या बेगूसराय के पुराने गणेश जन्मोत्सव—हर जगह यह परंपरा अपने स्थानीय रंग में दिखाई देती है।
गणपति केवल विघ्नहर्ता नहीं—वे उस परंपरा के प्रतीक हैं जो हर नए आरंभ से पहले अपनी जड़ों को प्रणाम करना सिखाती है।
Sanatana Bihar
Bihar is not just a place on the map.
It is a living civilisation.
और गणेश चतुर्थी उसी जीवित सभ्यता का एक ऐसा पर्व है, जहाँ आस्था, कला, लोक-संस्कृति और सनातन परंपरा आज भी साथ-साथ चलती है।