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Sanatana Bihar · Journal
By Sanatana Bihar • Published with devotion & purpose
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हरतालिका तीज 2026: बिहार की सनातन परंपरा, इतिहास, पौराणिक कथा और लोक-संस्कृति

Women performing Hartalika Teej puja with Shiva Parvati idols in a traditional Bihar village courtyard

हरतालिका तीज 2026 सोमवार, 14 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है और भगवान शिव तथा माता पार्वती की आराधना से जुड़ा है। 2026 में तृतीया तिथि 13 सितंबर की सुबह से शुरू होकर 14 सितंबर की सुबह तक रहेगी, इसलिए उदया तिथि के आधार पर 14 सितंबर को हरतालिका तीज मनाई जाएगी।

लेकिन बिहार में तीज को केवल एक व्रत के रूप में देखना इसके वास्तविक सांस्कृतिक महत्व को छोटा कर देना होगा। बिहार की धरती पर पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहते—वे लोकगीत, पारिवारिक परंपरा, खान-पान, स्त्री-स्मृति, हस्तकला और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बन जाते हैं।

हरतालिका तीज भी ऐसी ही एक जीवित परंपरा है।

Sanatana Bihar के लिए तीज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें बिहार की उस संस्कृति को समझने का अवसर देती है, जहाँ सनातन धर्म और लोकजीवन एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे में रचे-बसे हैं।

हरतालिका तीज क्या है?

हरतालिका तीज भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित एक महत्वपूर्ण हिंदू व्रत है। यह भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है।

इस दिन विशेष रूप से विवाहित महिलाएँ अपने वैवाहिक जीवन की मंगलकामना और पति के दीर्घायु होने की प्रार्थना करती हैं। अविवाहित कन्याएँ भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से इस व्रत को करती हैं। परंपरागत रूप से यह व्रत कठिन माना जाता है और कई महिलाएँ निर्जला उपवास रखती हैं।

बिहार में इसे सामान्य बोलचाल में अक्सर केवल “तीज” भी कहा जाता है। राज्य में इसके धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ स्थानीय रीति-रिवाजों और पारिवारिक परंपराओं का भी महत्वपूर्ण स्थान है।

हरतालिका तीज का नाम कैसे पड़ा?

“हरतालिका” नाम के पीछे एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है।

मान्यता के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। उनके पिता हिमवान उनका विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते थे। माता पार्वती की सखी उन्हें लेकर वन में चली गईं ताकि उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध न हो।

वन में माता पार्वती ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की।

इसी कथा से हरतालिका नाम जोड़ा जाता है—जहाँ हरत को हरण/ले जाने और आलिका को सखी के अर्थ से जोड़ा जाता है।

कथा के अनुसार भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन माता पार्वती ने शिव की आराधना की और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

इसलिए हरतालिका तीज को केवल पति-पत्नी के संबंध से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं है। इसकी मूल कथा में संकल्प, तपस्या, आत्म-इच्छा और साधना का भी गहरा तत्व दिखाई देता है।

हरतालिका तीज और शिव-पार्वती का संबंध

हरतालिका तीज की सबसे सुंदर परंपराओं में से एक है—मिट्टी या बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाना।

Woman worshipping Lord Shiva and Goddess Parvati during Hartalika Teej
हरतालिका तीज पर शिव-पार्वती की आराधना।

यह परंपरा माता पार्वती की तपस्या से जोड़ी जाती है। पूजा में बनाई जाने वाली ये प्रतिमाएँ किसी भव्य मंदिर की मूर्तियों की तरह स्थायी नहीं होतीं।

यही इसकी सुंदरता है।

मिट्टी से भगवान का रूप बनाना और उसी मिट्टी के सामने पूजा करना भारतीय लोकधर्म की उस भावना को दिखाता है जिसमें ईश्वर तक पहुँचने के लिए भव्य साधनों की आवश्यकता नहीं होती।

श्रद्धा, संकल्प और भावना ही पूजा का केंद्र हैं।

बिहार जैसे राज्य में, जहाँ मिट्टी और नदी-आधारित लोकजीवन की अपनी गहरी परंपरा रही है, यह प्रथा सांस्कृतिक रूप से भी विशेष अर्थ रखती है।

बिहार में हरतालिका तीज की परंपरा

बिहार की सांस्कृतिक पहचान में लोकगीतों का बहुत बड़ा स्थान है।

जन्म, विवाह, कृषि, ऋतु परिवर्तन और पर्व—लगभग हर महत्वपूर्ण अवसर के साथ बिहार में लोकगीतों की परंपरा जुड़ी रही है। बिहार पर्यटन भी राज्य की लोक-संस्कृति में त्योहारों और महत्वपूर्ण अवसरों पर गाए जाने वाले लोकगीतों की पुरानी परंपरा को रेखांकित करता है।

हरतालिका तीज भी इससे अलग नहीं है।

विशेषकर भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में तीज के अवसर पर शिव-पार्वती, सुहाग और दांपत्य जीवन से जुड़े गीतों की परंपरा देखने को मिलती है। भोजपुरी में तीज के लिए अलग से लोक और भक्ति गीत आज भी लोकप्रिय हैं।

इस प्रकार तीज के गीत केवल मनोरंजन नहीं हैं।

वे मौखिक इतिहास का भी एक रूप हैं।

एक पीढ़ी जिस गीत को गाती है, अगली पीढ़ी उसी गीत को सुनकर पर्व की स्मृति अपने भीतर ले जाती है।

तीज और बिहार का पारंपरिक भोजन

बिहार की किसी भी सांस्कृतिक परंपरा को उसके भोजन से अलग करके नहीं समझा जा सकता।

तीज पर अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में प्रसाद एवं पकवानों की परंपरा अलग हो सकती है। बिहार में पिडुकिया को तीज से जुड़ा पारंपरिक प्रसाद माना जाता है और इसके साथ अन्य घरेलू पकवान भी बनाए जाते हैं।

Traditional Bihar festive food prepared for Hartalika Teej
हरतालिका तीज से जुड़े पारंपरिक पकवान और प्रसाद की झलक।

पिडुकिया की उपस्थिति हमें यह बताती है कि बिहार में पर्व की संस्कृति केवल मंदिर और पूजा तक सीमित नहीं रहती।

वह रसोई तक जाती है।

और रसोई से परिवार तक।

मायके और तीज का रिश्ता

तीज की संस्कृति में मायके की स्मृति का भी एक महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष है।

भारत के कई हिस्सों में तीज के अवसर पर विवाहित बेटियों के मायके से साड़ी, चूड़ी, सिंदूर, मेहंदी और अन्य श्रृंगार-सामग्री भेजने की परंपराएँ मिलती हैं। इन परंपराओं के स्थानीय नाम और स्वरूप अलग-अलग हो सकते हैं।

Parents giving traditional Teej gifts to their married daughter in Bihar
तीज पर मायके से बेटी के लिए स्नेह और शुभकामनाओं की परंपरा।

बिहार में भी तीज का यह पारिवारिक पक्ष दिखाई देता है।

इसे केवल “बेटी का मायके आना” कहकर सीमित करना सही नहीं होगा। इसके पीछे एक बड़ा सामाजिक भाव है—

विवाह के बाद भी बेटी अपने मूल परिवार और सांस्कृतिक घर से जुड़ी रहती है।

यही कारण है कि तीज की स्मृतियाँ अक्सर महिलाओं के लिए धार्मिक होने के साथ-साथ पारिवारिक और सांस्कृतिक भी होती हैं।

सोलह श्रृंगार और तीज

हरतालिका तीज पर सोलह श्रृंगार की परंपरा भी महत्वपूर्ण है।

व्रती महिलाएँ पारंपरिक वस्त्र धारण करती हैं, मेहंदी लगाती हैं और विवाह के समय से जुड़े श्रृंगार को पुनः धारण करती हैं।

Woman getting ready with traditional solah shringar for Teej
तीज के अवसर पर सोलह श्रृंगार की पारंपरिक तैयारी।

इसके पीछे केवल सौंदर्य का भाव नहीं है।

श्रृंगार यहाँ सौभाग्य और मंगलकामना का सांस्कृतिक प्रतीक बन जाता है।

बिहार में तीज के अवसर पर लाल और हरे रंग की साड़ियाँ, मेहंदी, सिंदूर, चूड़ियाँ और पारंपरिक आभूषणों का प्रयोग उत्सव के दृश्य को विशिष्ट बनाता है। पटना में तीज समारोहों की रिपोर्टों में भी महिलाओं के पारंपरिक परिधान और सोलह श्रृंगार का उल्लेख मिलता है।

तीज की रात: कथा, भजन और जागरण

हरतालिका तीज की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसका रात्रि अनुष्ठान है।

कई स्थानों पर महिलाएँ रात में जागरण करती हैं, शिव-पार्वती के भजन गाती हैं और तीज की कथा सुनती हैं। बिहार में भी आठों पहर पूजा, मंत्र-जाप और भजन-जागरण की परंपरा का उल्लेख मिलता है।

यह परंपरा तीज को केवल दिन के एक पूजा-अनुष्ठान से आगे ले जाती है।

रात का जागरण सामूहिक स्मृति का समय बन जाता है— जहाँ कथा सुनाई जाती है, गीत गाए जाते हैं, और अगली पीढ़ी उन परंपराओं को देखती-सुनती है।

तीज: परंपरा से आधुनिकता तक

आज बिहार के शहर बदल रहे हैं। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवार बढ़ रहे हैं। गाँव से शहर और शहर से विदेश तक लोगों का प्रवास बढ़ा है। सोशल मीडिया ने त्योहार मनाने का तरीका बदल दिया है। फिर भी तीज समाप्त नहीं हुई। बल्कि उसने अपना रूप बदला है।

आज वही पूजा घर के छोटे से अपार्टमेंट में हो सकती है। वही तीज गीत YouTube पर सुना जा सकता है। वही मिट्टी की प्रतिमा ऑनलाइन खरीदी जा सकती है। और बिहार से दूर रहने वाली बेटी वीडियो कॉल पर अपनी माँ और परिवार के साथ तीज मना सकती है।

परंपरा का माध्यम बदल गया, परंपरा नहीं। यही किसी जीवित heritage की पहचान है।

बिहार में तीज: एक पर्व से कहीं अधिक

जब बिहार के किसी घर में तीज की पूजा के लिए मिट्टी से शिव-पार्वती का रूप बनाया जाता है, तो वहाँ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं हो रहा होता। वहाँ एक पुरानी कथा वर्तमान में दोबारा जीवित हो रही होती है।

जब माँ अपनी बेटी को पूजा की विधि बताती है, तो केवल एक व्रत की जानकारी आगे नहीं बढ़ती— एक संस्कृति आगे बढ़ती है।

जब तीज का गीत अगली पीढ़ी सुनती है, तो केवल संगीत नहीं बचता— लोक-स्मृति बचती है।

और जब बिहार की कोई बेटी दूर शहर में रहकर भी तीज के दिन अपने घर की परंपरा निभाती है, तो यह साबित होता है कि heritage केवल पुरानी इमारतों में नहीं होती।

Heritage उन परंपराओं में भी होती है जिन्हें लोग आज तक जी रहे हैं।

यही है बिहार की सनातन विरासत।

Sanatana Bihar

Bihar is not just a place on the map.
It is a living civilisation.

हरतालिका तीज उसी जीवित सभ्यता का एक सुंदर अध्याय है—जहाँ आस्था, लोक-संस्कृति, परिवार और सनातन परंपरा आज भी साथ-साथ चलते हैं।

 

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